Monday, March 12, 2012

ग़ज़ल - खुशबु पसीने से


जरा कुछ आग भी बाहर निकालो आप सीने से
कभी दुःख कम न होंगे दोस्तों बस दर्द पीने से

भले तोडा मगर थोड़ी सी तो तहजीब रहने दो
ये टुकड़े है मेरे दिल के इन्हें रक्खो करीने से

भुला रक्खा है बरसों से मेरी चाहत तेरे दिल ने
मुझे भी याद तुम आए नही हो कुछ महीने से

कमाके मैंने माँ के हाथ मेहनत सौप दी अपनी
अजब खुशबु सी अब आने लगी मेरे पसीने से

मेरा क्या है मुझे सब लोग माथे पर सजाएंगे
मगर तुम हाथ धो बैठोगे मुझ जैसे नगीने से


......................................................अरुन श्री!

ग़ज़ल - ऊँची ईमारत


बेवफा होना तेरा क्या क्या सितम ढाने लगा
अब तो मैं मंदिर में भी जाने से घबराने लगा

हो अलग तुमने जला डाली थी मेरी याद तक
मैं तेरी तस्वीर से दिल अपना बहलाने लगा

भोर की पहली किरण जिसको चुराकर मैंने दी
दूसरे के घर को अब वो फूल महकाने लगा

सर्द रातों में लिपट जाता था कोहरे की तरह
मैं बना सूरज तो दुःख का चाँद शरमाने लगा

घर के आगे जब से इक ऊँची ईमारत बन गई
मेरे घर आने से अब सूरज भी कतराने लगा




…………………………………........…................. अरुन श्री !

पुराने घाव - नई उँगलियाँ


बहुत दुखते हैं
पुराने घाव ,
जब आती हैं
मरहम लगाने
नई उँगलियाँ !
उन्हें नही पता -
कितनी है
जख्म की गहराई ,
क्या होगी
स्पर्श की सीमा !
उसमे नही होती
पुराने हाथों जैसी छुअन !

रिसने दो
मेरे घावों को ,
क्योकि बहुत दुखतें हैं
पुराने घाव
जब आती है
मरहम लगाने
नई उँगलियाँ !

अब और दर्द सहा न जाएगा !


.................................... अरुन श्री !

दीपावली


दीपावली की रात है !
अभी बाकि भी है,
बस खत्म होना चाहती है !

अभी जब डूबा था
पिछला सूरज,
जलाए थे दिए मैंने
खुशी के,
प्रीत के,
अर्थ खोती रीत के !

डूब गया था कालापन
नई रंगीनियों में !

पुरानी करवटों पर
डाल दी थी नई चादरें !

खरीद ली थी
बिकाऊ मिठाइयां !

लेकिन नही खरीद पाया,
मिठास
जिंदगी की !
दूर नही हुआ
विचारों का कसैलापन !

अभी-अभी बदले चादरों पर
उभर आई है
पुराने बिस्तर की सिलवटें !

रंगीन किए हुए दीवारों से
झक रहे है अब भी
कुछ पुराने धब्बे !

पटाखों के शोर में भी
चीखता है ह्रदय के कोने से
एक अंतहीन सूनापन !

दिए की जगमगाती रोशनी से
चौंधियाती हुई आँखों में ,
एक कतरा अँधेरा
कहीं सहमा हुआ है !!


................................ अरुन श्री !!

एक मुट्ठी धूप


तुम्हे शिकायत है
इस गहरे अँधेरे से ,
पर क्या तुमने कोशिश की
एक दिया जलने की !
या मेरे हाथों से हांथों मिलाकर
बनाया कोई सुरक्षा घेरा !
कुछ जलते दीयों को
हवा से बचाने के लिए !

नही ना ?

कोई बात नहीं !
अभी सूखा नही है
समय का फूल !

चलो ढूँढे !
समंदर में डूबे सूरज को ,
इकठ्ठा करें
एक मुट्ठी धूप ,
उछाल दें पर्वतों पर ,
घाटियों में भी !
खिला दें
मुरझाते फूलों को !

कुछ तो पिघले ,
गुलाब की पंखुड़ियों पर जमी
ओश की बूंदें !
और पहुंचे
नर्म नंगी दूब तक !

वो दर्द
जो ठंढी हवाओं ने बढ़ा दिया है
कुछ तो कम हो !




..................................... अरुन श्री !

कहो मानव


तुम शीश झुकाते हो
सम्मुख किसी देव के ,
और तुम्हारी आत्मा कर उठती है
ईश्वर विरुद्ध आचरण !

तुम्हे कंठस्थ है अक्षरसः
अपने धर्मग्रन्थ ,
परन्तु खो दिए तुमने
उसके प्रकाश शब्द
जो प्रभु के अंतःकरण से निकले !

तुम्हारे होंठ हिलते है
प्रार्थना के लिए
और उसी समय
तुम्हारे ह्रदय भरे होते है
भौतिक वासनाओ से !

कहो मानव !
क्यों न अस्वीकार कर दी जाए
तुम्हारी प्रार्थनाएं !




................................ अरुन श्री !

ग़ज़ल - बंजर रहने दो


नहीं चाहता तुम ख्वाबों के प्यारे मंजर रहने दो
पर सूखे होंठों की खातिर नयन समंदर रहने दो

नीद लूट ली सपने छीने रीत गई अब आँखे भी 
मेरे हिस्से में कम से कम ये दिल बंजर रहने दो

गुम रहते हो मंदिर के यश गानों और चढावों में
क्या छीनोगे तुम कातिल हाथों से खंजर रहने दो

मेरे दिल पर राज करोगे क्या कहते हो छोडो भी
इस पागल को मेरे रब का मस्त कलंदर रहने दो 



.................................................... अरुन श्री !

सार्थक या अर्थहीन ?


नदी
धरती की छाती से निकली
दूध की धारा !
जीवन बाटती है !

लेकिन दूर नही कर पाती
सागर का खारापन !

कुछ ही पलों में
अर्थहीन हो जाती है
एक लंबी और सार्थक यात्रा !




.......................... अरुन श्री !

पिता


वो कोई अवतार नही है
न ही कोई शापित देव
पुराने मंदिर के द्वार पर
अडिग खड़ा
वक्त के थपेडों को मुह चिढाता
एक बुढा पेड़ है वो !

हे ईश्वर !
मेरे बच्चे को भी मिले
इसकी ममतामई
और अनुभवी छाव !


........................... अरुन श्री !

सार्थकता


खोज में
प्रकाश के रहस्य की
एक पतंगा
जल जाता है
हटाते हुए
दीप शिखा का परदा  !

एक छछुंदर
बिता देती है सारा जीवन
अँधेरे में
मृत्यु के डर से

निरर्थक जीवन से अच्छी है
सार्थक मृत्यु !


......................... अरुन श्री !

उत्तर ढूंढना है


काश !
कोई दिन मेरा घर में गुजरता
बेवजह बातें बनाते
हँसते – हँसाते
गीत कोई गुनगुनाते
पर नही मुमकिन
मैं दिन घर में बिताऊँ!

एक नदी प्यासी पड़ी घर में अकेले
और रेगिस्तान में मैं जल रहा हूँ
थक चुका पर चल रहा हूँ
ढूढता हूँ अंजुली भर जल
जिसे ले
शाम को घर लौट जाऊँ
प्यास को पानी पीला दूँ !

मेरे आँगन की बहारों पर
जवानी छा गई है
और मैं
धूप के बाज़ार में बैठा हुआ हूँ
सूखता हूँ
भीगी लकड़ी की तरह से
घर के चूल्हे में
अभी जलना भी होगा !

चाहता हूँ
मेरे आँगन की बहारें
खिल उठे
प्यार का मेरे मधुर स्पर्श पाकर
सोचता हूँ डूब जाऊँ
प्यार की प्यासी नदी में !

पर विवश हूँ
क्या करूं मैं
भूख की रेखा खिची है ,
प्रश्न रोटी का खड़ा है बीच अपने
और उत्तर ढूंढना है !!



............................................ अरुन श्री!

कन्यादान


कन्यादान-
वो अलौकिक शब्द ,
जो ले जाता है हर माँ को
बेटी के बचपन तक ,
स्मृतियों के आंगन तक !
.
बार बार नज़र उठती है
छुप छुप कर ,
रुक रुक कर ,
टीन के पुराने बक्से में बंद
गुड्डे-गुड़ियों की ओर !
और नयन  कोर
बार बार भीगते है ,
भीग भीग सूखते है !
.
आज देखकर
दुपट्टा संभालती बेटी को ,
अचानक याद आ जाती है
बदन में धूल
और बालों में पुआल लपेटे ,
दिन भर की थकन आखों में समेटे
सामने खड़ी बेटी !
जो सोती भी ना थी
बिना माँ की धड़कन सुने !
.
आज सोचती है
बहुत दिन हुए ,
बेटी को अपनी धड़कन सुनाए !
दुनियादारी की बातें सुनते सुनते
अब तो भूल भी गई होगी !
फिर से मन करता है
कि बेटी को सीने से लगाए ,
उसे धड़कन सुनाए
और सपने भी
जो उसके लिए बुनती रही
अब तक !
.
दान-
प्राण में बसी बेटी का
कितना दारुण ,
लेकिन कितना महान !
ये भी तो है
कर्ण का सा महादान !
लेकिन फिर भी डर है ,
आकुल अंतर है -
कि दान लेने वाला
कहीं इन्द्र तो नही ?
.
.
............................. अरुन श्री !

ग़ज़ल - तलाश करो


आँशुओं कोई घर तलाश करो
सीपियों सी नज़र तलाश करो

छाँव लेकर जो साथ-साथ चले
ऐसा कोई शज़र तलाश करो

जान रखना हथेलियों पर ही
दौलतेदिल अगर तलाश करो

मंजिलें प्यार की रुला देंगी
जिंदगी का सफर तलाश करो

तीर बन जाएगी ग़ज़ल तेरी
खूनेदिल में असर तलाश करो

मेरी गज़लों में खून है! छोड़ो
आप इनमे बहर तलाश करो


…………………. अरुन श्री !

बिन तुम्हारे मैं अधूरा


अश्रु गण साथी रहे
मेरे ह्रदय की पीर बनकर !
रात चुभ जाती हमेशा तीर बनकर !
मैं भटकता नीर बनकर !
तुम सुनहरे स्वप्न सी हो
मैं नयन हूँ !
बिन तुम्हारे मैं अधूरा
और मेरे बिन तुम्हारा अर्थ कैसा !

जीत की उम्मीद से प्रारंभ होकर
निज अहम के हार तक का ,
प्रथम चितवन से शुरू हो प्यार तक का ,
प्यार से उद्धार तक का
मार्ग हो तुम !
मै पथिक हूँ !
निहित हैं तुझमे सदा से
कर्म मेरे
भाग्य मेरा,
और सार्थकता तुम्हारी
कौन है मेरे अलावा !

मेरे माथे का तिलक हो
कौन कहता धूल हो तुम !
कीच में हो किन्तु पावन फूल हो तुम !
रंग की सुन्दर मरीचिका से परे
तुम गंध हो !
मैं पवन हूँ !
है तेरे सानिध्य से पहचान मेरी ,
और मेरे बिन
तुम्हारा भी कहाँ अस्तित्व होगा !

तुम विभा हो
और मैं  
तेरा अरुण हूँ !
कर्म मैं विश्राम हो तुम !
मैं नही तो कौन तुमको मान देगा
तुम न हो तो
कौन देगा अर्घ्य मुझको !


......................................अरुन श्री !

Wednesday, February 1, 2012

तुम जिन्दा हो

पास हो मेरे ये कितनी
बार तो बतला चुके तुम !
कौन कहता जा चुके तुम ?

आँख जब धुंधला गई तो
मैंने देखा
बादलों में थे तुम्ही तुम  ,
और फिर बादल नदी बन
बह चले थे ,
नेह की धरती भिगोते
और मेरी आत्मा हर दिन हरी होती गई !
उसके पनघट पर जलाए
दीप मैंने स्मृति के !
झिलमिलाते मुस्कुराते
तुम नदी के जल में थे !
जब भी दिल धडका मेरा तब 
तुम ही उस हलचल में थे !

तुम चले आते हो छत पर
रात का श्रृंगार करने ‘
चाँद बनकर
और सूरज को सजाते हो
उजालों से !
जगाते हो मुझे शीतल चमकती-
रोशनी की उँगलियों से !

बृक्ष की छाया बने तुम
जब दुखों के जेठ में
मैं जल रहा था !
सोख लेते हो तपिस
तुम दोपहर के सूर्य की भी !

मैं तेरी आवाज सुनता हूँ
हवा की सरसराहट में !
और ये ऋतुएं तुम्हारे  
नाम की चिट्ठी मुझे
देती रही है !
मैंने भी जो खत लिखे
तेरे लिए
हर शाम
नदियों के हवाले कर दिया है !
मिल गए होंगे तुम्हे तो ?

अब जुदा हम हो न पाएँगे कभी भी ,
इस तरह अपना चुके तुम !
कौन कहता जा चुके तुम ?

मर चुका हूँ मैं तुम्हारे साथ साथी
और तुम जिन्दा हो अब भी
इस ह्रदय में पीर बनकर
इस नयन में नीर बनकर !




.................................. अरुन श्री !

Saturday, October 1, 2011

हाँ, मैं हूँ कवि !

हाँ, मैं हूँ कवि !
कारण,
वियोग है मन में
आँखों से कविता छलकी
और आह छिपा गायन में
हां ,
मै हूँ कवि !!

----------------- --- अरुन श्री !

अम्मा

जब भी रोते - रोते हंस दी
मुझको बहुत सुहाई अम्मा

जेब में वापस रख देती है
लेती नही कमाई  अम्मा

"तुम ही ह़ो धन दौलत मेरे"
कहकर बस मुस्काई अम्मा

बचपन में जब भी रोया मैं
खुद बन गई मिठाई अम्मा

ममता की डोरी से मुझको
देना  नही रिहाई  अम्मा

जब भी  उससे रूठ गया मै
रो-रो कर अधियाई अम्मा

पहले सी मासूमियत

याद आता है
अपना बचपन,
जब  हम उड़न में रहते थे
बेफिक्री के असमान में रहते थे
दिन गुजरता था बदमाशियों में
पर रात अपने ईमान में रहते थे !
याद आता है,
दिन भर तपते सूरज को चिढाना
आंधियो के पीछे भागना
उनसे आगे निकलने की कोशिश करना
जलती तेज हवाओं से हाथ मिलाना,
और फिर ..............
पता ही नही चला कि
कब माँ के कहानियो की गोद से उठकर
हमारी नींद सपनो के आगोश में चली गई !

दिन से अच्छी थी रातें
हमेशा से
और ईमानदार भी !
इन्ही रातों की
चमकती चांदनी की रेत में लिपटे हुए
अपने आप में खोए
अपने मासूमियत के दायरे में सिमटे हुए
अक्सर ये वादा किया खुद से
की छोड़ेंगे नही,
बचपन की मासूम मुहब्बत को !
उसी चमकती रेत को बताया
अपना पहला सपना,
उसी की हंथेली पर लिखा
अपने पहले प्यार का नाम,
जब खुश हुए
उसी की गोद में किलकारियां भरी,
जब उदास हुए
उसी के सिने लिपट कर रोए भी !

याद आती है आज
वो माँ की कहानियो से भरी रातें !
वो रातें भी,
जो अकेले में
चांदनी से बतियाते हुए खर्च कर दी !
वो अनमोल रातें
चमकती रेत सी रातें
काम से काम चुभती तो नही थी,
सड़को के धुल की तरह
आँखों में !

आज सोचता हूँ अक्सर
कि इन चमचमाती सड़को से भली थी
अपने गाव कि पगडंडियाँ,
जिन पर चले
कई बार गिरे
और संभल भी गए
कभी हिम्मत नही छूटी !
हर लड़खड़ाहट पर निश्चय किया
"हारेंगे नहीं !"
"टूटेंगे नहीं !"
लेकिन आज हरा दिया
इन सड़को कि रफ़्तार ने,
धीमी पड़ गई सपनो की गति,
भूलने की कगार तक आ पहुंचा
बचपन से किया हर वादा!
बड़ी बड़ी इमारतों से
ढक गया चाँद !
कही खो गई
दिनों के बोझ तले
चांदनी की चमकीली रेत
अब आँखों में नही चमचमाती
अब तो चुभती है
सड़को की धुल !
दिन अब उर्जावान नही रहे ,
बोझिल ह़ो गए !
रातें अब ईमानदार नही रही !
और हममे भी नही रही
पहले सी मासूमियत !!!!

........................................ अरुन श्री !

कहानी फूल की

क्यों मिली है कुछ पलों को बागवानी फूल की
उम्र   भर  कहते  रहेंगे हम   कहानी फूल की

वो मेरे सीने से लगकर हाले-दिल कहते रहे
फूल  सी बातें सुनी हमने  जुबानी फूल  की

मनचले भवरे चमन  के  पास मंडराने लगे
चुभ रही है आँख में सबके जवानी फूल की

क्या पता किस बात पर वो हँसते-हँसते रो पड़ी
मैं समझ पाया न तबियत की रवानी फूल की


.......................................................अरुन श्री !

रूठ न जाना

साथ चले ह़ो तो जीवन भर साथ निभाना
साथी,
रूठ न जाना !

मैंने कब ये चाहा था तुम
मुझपर सर्वश्व न्योछावर कर दो
कब चाहा था मैंने तुम
अपने इन कोमल कंधो पर
मेरी आशाओं का अम्बर लो
पर तुम आए
आँख झुकाई
हौले से
थोडा मुस्काए
और मेरे बोझिल कंधो पर
फूल सा अपना हाथ रख दिया
मेरे थके बिंधे पंखो को
फिर से नई उडान मिल गई
ऊपर अम्बर नीचे सागर
फिर भी धुंधलाते नयनो को
सागर तट की पहचान मिल गई
उठेंगे तूफान तो उनमे खो मत जाना
साथी,
रूठ न जाना !

योग्य नही संभवतः इसके
फिर भी पाया प्यार तुम्हारा
है सहश्त्र आभार तुम्हारा
मात दिया तेरे आँचल ने
सूरज की तपती किरणों को
मेरी खातिर
तपते रस्ते पर
तुमने शीतलता कर दी
मुझ पाषाण ह्रदय में तुमने
थोड़ी सी कोमलता भर दी
दुःख पहुचेगा, अब मत ठेस लगाना
साथी,
रूठ न जाना !
 
 
----------------------------------अरुन श्री !